अपार संभावनाओं एवं समस्याओं से घिरे हुए छत्तीसगढ़ का भविष्य किसी ज्योतिषी से कूंडली मिलाने से और न ही कंम्प्यूटर इंटरनेट से बनेगा । छत्तीसगढ़ का भविष्य छत्तीसगढ़ लोगों के हाथ की बात है । विकास की आज सर्वमान्य नीति भूमंडलीकरण वैश्वीेकरण या उदारीकरण माना जाता है ।


अपार संभावनाओं एवं समस्याओं से घिरे हुए छत्तीसगढ़ का भविष्य किसी ज्योतिषी से कूंडली मिलाने से और न ही कंम्प्यूटर इंटरनेट से बनेगा । छत्तीसगढ़ का भविष्य छत्तीसगढ़ लोगों के हाथ की बात है । विकास की आज सर्वमान्य नीति भूमंडलीकरण वैश्वीेकरण या उदारीकरण माना जाता है ।

सवाल ये है कि छत्तीसगढ़ भी क्या इसी लीक पर प्रगति करे इक्कीसवी सदी में जाने के लिए? 1 बहुराष्ट_ीय कंपनी, विदेशी पूंजी, आयात नीति के लिए मार्ग खोल दें? 3 शास./निजी क्या छत्तीसगढ़ समाज को आधुनिक बनाने के लिए इस संस्कृति, अस्मिता, मौलिकता से अवकाश ले ले जिसके नाम पर छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ है । छत्तीसगढ़ की विपुल खनिज संपदा लोहा, कायेला, डोलोमाइट, बाक्साइट के अतिरिक्त सोना हीरा कोरेण्डम जैसे कीमती खनिज से भविष्य में उद्योग व्यापार की अपार संभावनाएं है । पूंजी मशीन लगाने वाले यहां की आर्थिक उत्पादन क्षमता बढ़ायें । भूमंडलीकरण से दोहन तो तभी सार्थक है किंतु इससे शोषण न हो । अर्थशास्त्रियों ने ठीक ही कहा है कि उदारीकरण से मुट्ठी भर लोग लाभान्वित होते हैं और बहुल समाज लाभ से वंचित रहता है । वैश्वीकरण या उदारीकरण आम लोंगों के लिए उदार नहीं है अत: छत्तीसगढ़ के लोगों को सक्षम बनाने की नीति अपनाये तथा इसे चुनौती के रुप में ले ।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति तो कृषि संस्कृति है यह प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है ।धान की हजार प्रजातियां छत्तीसगढ़ की अस्मिता है । यहां के दुबराज, बादशाह भोग को पेटेंट के लिए अमरीका दाँव लगाय े बैठा है । इतना ही नहीं अमरीका, बीज, खाद दवाएं व अन्य सुविधाएं धान के कटोरे के लिए लेने बाध्य किया जा रहा है । कृषि को स्वालंबन बनाने के लिए गौ सेवा संघ ने निष्कर्ष निकाला है कि हर गाय सौ डिसमिल को संपन्न् बनाने में सक्षम है गोबर से गांव गांव में हालर, धानी चक्की, बुनकर उद्योग, रेशम, कोसा, जड़ी-बूटी, रोपण उत्पादन, मिट्टी कला, चमड़ा लौह उद्योग वृध्दि से शोषण के रास्ते बंद हो जाते हैं जो भूमंडलीकरण में सहज हैं ।

इस कृषि संस्कृति ने लोक कला संस्कृति को जीवंत रखा है । करमा, ददरिया, पंथी, प ंडवानी, यह जीवन पध्दति है । क्या इसे वैश्वीकरण के हाथों नियंत्रित कर उनके लिए आय वृध्दि का माध्यम बनाया जाये? 1 छत्तीसगढ़ चलचित्र के नाम पर बालीवुड फेम गीतकार गायक निर्देशक निर्माता संस्कृति में दखल दे रहे है । गीतकारों के शब्द चयन में अपना पांडित्य, लय धुन में अपनी टेक, कुल मिलाकर संस्कृति पर व्यावसायिकता को हावी बना रहे हैं । यह संस्कृति पर उदारीकरण का हमला है । हां सक्षम कलाकार यदि उन्हें विकास की मार्ग बताये तो उनकी उदारता प्रशंसनीय रहेगी ।

प्रसिध्द समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे का कथन है – समाज की जड़ें अतीत में होती है, वह वर्तमान में जीता है और भविष्य उसके लिए चिंता और प्रावधान का विषय होता है । परम्परायेंं अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ती है उनके माध्यम से सामाजिक जीवन को निरंतरता मिलती है और उसका स्वरुप निर्धारित होता है । छत्तीसगढ़ के विकास मे ंऐसी समझ को प्रमुखता देने की आवश्यकता है । वैश्वीकरण को केवल आर्थिक (औद्योगिककृषि) कृषिमहाविद्यालय110) उत्पाद में वृध्दि, लक्ष्य ही नहीं, उसने सामाजिक क्षेत्र में पकड़ रखने का लक्ष्य रखा है ।इसके लिए नेटवर्क का जाल है ।

मीडिया के क्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी व उपग्रह संचार सेवा से प्रशिक्षित व सक्षम बनाने का प्रयत्न किया हैहां जिस समय पलायन और भूखमरी से छत्तीसगढ़ की जनता छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए विवश हो गई उस समय गांव गांव को खासकर सुदूर पिछड़े जन जाति इलाके को टेलीफोन से जोड़ने का कार्यक्रम बना । जिस क्षेत्र के सत्तर प्रतिशत लोग साक्षरता से दूर, गरीबी रेखा से नीचे और अवसर से वंचित निवासहीन जैसे हों उनकी प्राथमिकता पर ध्यान देना आवश्यक है । ऐसे लोगों के लिए मीडिया सूचना तकनीक इंटरनेट सब्जबाग है । किसी ने ठीक ही लिखा है बिजली बल्ब के अविष्कार हुए150 ङ्कह्न वर्ष हो गये किंतु इन पचास वर्षों में पचीस प्रतिशत क्षेत्र में बिजली नहीं दी गई है । विकास की प्राथमिकताएं विदेश से आयातित नहीं होती, उन्हें अपनी ही भूमि में तलाशना होगा । हमें आलू का उत्पादन बढ़ाना होगा अंकल चिप्स बर्जर जैसी चीजें उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा देती है । छत्तीसगढ़ की संस्कृति को नहीं । उपभोक्ता संस्कृति हमारी स्वरुप परंपरा को केंसर के कीड़े की पंरपरा में डाल रही है । स्वस्थ्य परंपरा की सुरक्षा से सामाजिक परिवर्र्तन सहज है ।

प्रोफेसर अमर्त्य सेन का कहना है कि आज के युग में सभी आर्थिक विकास में प्राथमिक शिक्षा को महत्व से स्वीकार करते हैं – फिर भी भारत में इस बात की अनोखी होना बहुत ही आश्चर्य की बात है । संकुचित आर्थिक परिवर्तनों के साथ-साथ सामाजिक कार्यक्रमों विशेषकर प्राथमिक शिक्षा में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाए जाने चाहिए , इसमें भी एक विडम्बना है कि प्राथमिक शिक्षा की असफलता को अपेक्षा उच्च शिक्षा कालेज विश्वविद्यालयीन शिक्षा में भारी सफलता मिल रही है । अर्थात एक पूंजी वाले है ं उन्हें ही विकसित करने का अवसर मिल रहा है । ऐसी प्रवृत्ति उसी भूमंडलीकरण का षड्यंत्र है जिसके भागीदार आबादी के दस पंद्रह प्रतिशत के लोग हो । इस नकारात्मक सोच को बदलना आवश्यक है, शिक्षित होने पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सोच बढ़ जाएगी फिर भी शोषण और द्रोहन में अंतर लगा सकेंगे ।
source:vipravarta.org

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