परशुराम जयंती

भगवान परशुराम

भगवान परशुराम डॉ शीतला प्रसाद द्विवेदी रायबरेली उत्तर प्रदेश
भृगु वंशीय महर्षि ऋचिक के पौत्र महर्षि यमदग्नि और उनकी भार्या रेणुक ा के पुत्रों में समण वेनु, सुपेण, वसु में राम सबसे कनिष्ठ थे । जिनका जन्म बैसाख शुक्ल पक्ष तृतीया को रात्रि के तीसरे पहर में हुआ था । छोटे पुत्र राम नौ कलाओं से युक्त होकर पैदा हुए थे जिन्हें भगवान विष्णु का छठवां अवतार माना जाता है ।
मीन कमल शूक नर हरी । वामन परशुराम धनु धरी ।।
वैदिक युग (सतयुग) था । बालकराम ने अपने जेष्ठ भ्राताओं के सात आचार्य वृद्धश्रवा और कवि कुलगुरू चायमान से समस्त वेदों का सागों पांग अध्ययन कर लिया । पिता महर्षि यमदग्नि ने कनिष्ठ पुत्र राम की तिलक्षण प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें महिर्ष अगस्त तथा लोप मुद्रा के आश्रम में विद्याध्ययन करने को भेज दिया । बालक राम ने थोड़े समय में ही ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर लिया जिससे भृगुकुल की प्रतिष्ठा दशों दिशाओं में फहरान ेलगी । ब्रह्मचारी बल्कि राम के ब्रह्मतेज और छात्र तेज का प्रकास यश रूप में फैल गया जिससे राजाभी संशक्ति हो उठे ।
वैदिक युग (सतयुग) में मनुष्यों में श्रेष्ठ बुद्धिमान और तेजस्वी ब्राह्मणों ने यज्ञ और तप द्वारा अपनी शक्ति प्रचण्ड कर ली थी और वर्ग समाज का नेतृत्व करना चाहते थे । सम्पूर्ण भूण्डल में उनका अधिकार भी थापरंतु क्षत्रीय शासकों की राजसी चकाचौंध के समक्ष आडम्बरहीन सरल और विद्वान ब्राह्मण ठहर नहीं सके और वे बड़े- बड़े राजदरबारों की शोभा बढ़ाने लगे । वशिष्ठ, पुलस्य, शतानन्द आदि आदि वरिष्ठ महर्षि सूर्य चन्द्र पुस निमि, हैहदयवंशीय क्षत्री राजाओं के कुलगुरू बनकर अपने कार्य को समाप तमान बैठे । गाधि पुत्र महाप्रतापी विश्वरथ ने राज्य का परित्याग कर महर्षि विश्वामित्र बनना श्रेयस्कर समझा ।
ऐसे समय में प्रजा से असंतोष फैल चुका था । तरह तरह के करों से प्रजा बोझित हो रही थी । प्रजा दासता की जंजीर में बंधती जा रही थी सभी राजागण विलास की चरम सीमा पर पहुंच गए थे । मनुष्यों में कलहपूर्ण वातावरण फैल गया था ।
असुरों ने ऐसा अवसर पा राक्षसी विज्ञान की ओर ध्यान दिया और उन्नति करके विश्व में अधिकार जमाने लगे । महर्षि वशिष्ठ और महर्षि पुलस्य की कृपा से महिष्मती का सम्राट सहस्त्रबाहु कीर्तवीर्य अर्जुन विश्वविजय कर हैहय वंश की कीर्ति को चारो दिशाओं में फैला दिया । यह सम्राट अर्जुन, क्षत्रीयो ंका नेतृत्व कर रहा था जो महर्षि यमदग्नि का साढ़ू था । महर्षि को अपने साढू अर्जुन का कार्य अनुचित लगा तो उन्होंने उसका विरोध किया । सम्राट अर्जुन महर्षि यमदग्नि से बहुत नाराज हो गया तथा पूर्ण भृगुवंश को समाप त करने का प्रण किया ।
सम्राट अर्जुन ने भृगवंशीय ऋषि मुनियों के आश्रम जला दिए । महर्षि यमदग्नि ने अर्जुन को समझाने का प्रयास किया किन्तु वह नहीं माना तो महर्षि यमदग्नि को रक्षार्थ अस्त्राशास्त्र उठाने पड़े । सम्राट अर्जुन महर्षि यमदग्नि के आश्रम से राम की माता रेणुका का तथा राम की मौसी की पुत्री लोमा को बन्दी बनाकर अपने साथ ले गया ।
बालक राम ने बंधन मुक्त होते ही सहस्त्रबाहु अर्जुन पर आक्रमण कर दिया । चौदह वर्षीय राम निअस्त्र थे अत: युद्ध नहीं कर सके । लोमाने अग्नि में प्रवेश कर अपने सतीत्व की रक्षा की । राम मेन केन प्रकारेण अपनी माता को अपने कंधे पर बिठाकर सहस्त्रबाहु अर्जुन के कारागार से निकालकर अपने आश्रम लौटे । उस कामी के कुकृत्य को देखकर बालक राम बहुत दुखी थे । कोई भी ऋषि सहस्त्रबाहु अर्जुन के डर से उन्हें सहयोग नहीं दे रहा था । निराशा राम कैलास पर्वतपर विराजमान भूतनाथ भगवान शंकर की शरण में गए और उन्होंने भगवान शिव को गुरू मानकर उनके चरणों में बैठकर शस्त्र अस्त्र की शिक्षा ली । आशुतोष भगवान ने उन्हें उनकी प्रतिभा के अनुकूल अति बला विद्या और अप्रतिहत गत प्रदान की । साथ ही साथ अजेय होने का आशीर्वाद दिया । इस प्रकार भगवान परशुराम अजेय और अमर बन गए ।
किसी कारणवश एक दिवस मां पार्वती पुत्र जगत पूज्य गणेश जी से तथा राम से विवाद हो गया । राम ने गणेश जी को भूमि में पटक दिया । जिससे उनका एक दांत टूट गया । राम ने गणेश जी का दिव्य अस्त्र परशु उनसे छीन लिया । जब यह तथा भगवान शंकर को ज्ञात हुआ तो उन्होंने राम का नाम परशुराम कर दिया । ये उद्धर्व बिन्दु बाल ब्रह्मचारी ऋषि है । भगवान विष्णु ने इन्हें चिंरजीवी होने का वरदान दिया । इन्होंने ब्रह्चर्य केप्रताप से मृत्यु को भी जीत लिया है । इनकी आयु वरदान के कारण स्थिर है ।

महर्षि यमदग्नि ने रेवा नदी के तट का अपना आश्रम छोड़ दिया क्योंकि वहीं उनकी तपस्या में विध्न पडऩे लगे थे । उन्होंने सरसव्ती नदी के तट पर उत्तराखण्ड में अपना आश्रम बनाया । भगवान परशुराम ने अपने पिता से निवेदन किया वे रेवा नदी के आश्रम को न त्यागे । आप सम्राट अर्जुन के समक्ष घुटने न टेके । सम्राट अर्जुन को पुन: महर्षि के अपने आश्रम में लौटने की जानकारी जब मिली तो उन्होंने षडयंत्र रचकर राम की माता रेणुका को कलंकित करने का अर्नगल प्रचार किया । । महर्षि यमदग्नि इससे बहुद दुखी हुए और अपने श्रेष्ठ पुत्रों को आज्ञा दी कि वे अपनी माता का वध कर दे किन्तु कोई भी माता का वध करने को तैयार नहीं हुआ । महर्षि यमदग्नि ने परशुराम से आदेश के रूप में कहा तो उन्होंने माता का शीश काट कर पिता को समर्पित कर दिया ।
परशुराम पितु आज्ञा राखी । माटी मातु लोक सब राखी ।
बड़े-बड़े ऋषियों ने एकत्रित होकर एक स्वर से घोषणा की कि माता रेणुका का असूरों के षडयंत्र का शिकार हुई है । वे नितान्त पवित्र है । महर्षि बहुत दुखी हुए । उन्होंने पितृ भक्ति और आज्ञाकारिता पर परशुराम से वरदान मांगने को कहा तो परशुराम ने कहा मुझे मेरी मां चाहिए । महर्षि यमदग्नि ने मंत्र बल से माता रेणुका को जीवित कर दिया ।
सहस्त्रबाहु कीर्तिवीर्य अर्जुन का घमंड और अत्याचार बढ़ता गया । एक दिन वह घमण्ड में सागर तट पर आकर समुद्र में तीर मारने लगा । सागर ने डरकर आत्म समर्पण कर दिया । वह रेवा तट पर स्थित महर्षि यमदग्नि के आश्रम पर आया । महर्षि ने राजा होने के कारण उसका बड़ा आदर सत्कार किया । चलते समय उसने कामधेनु गाय मांगी । महर्षि आश्रम में उस समय नहीं थे । अत: कामधेनु का बछड़ा लेकर वह चला गया । परशुराम के आने पर महर्षि ने उन्हें सारी बात बताई। परशुराम सम्राट के महल में गए । महलम ें बछड़े को असहाय देख उन्हें क्रोध आ गया । वे सहस्त्रबाहु के शयन कक्ष में जा पहुंचे । दोनों में द्वन्द युद्ध हुआ । सहस्त्र बाहु परशुराम के फरसे से मार गिराया । बछड़े को बड़े स्नेह केसाथ वे आश्रम में वापस ले आए ।
एक दिन भगवान परशुराम के पिता महर्षि यमदग्नि अपने आश्रम के समाधिस्थ थे। भगवान परशुराम जंगल में लकड़ी लाने के लिए गए थे । बदले की भावना से कीर्तवीर्य अर्जुनके पु6ों ने महर्षि यमदग्नि की हत्या कर दी । परशुराम ने लौटने पर पिता की हत्या का दृष्य देखा । अपने पिता का अंतिम संस्कार किया और प्रतिज्ञा की कि मैं पृथ्वी को क्षत्रीयों से विहीन कर दूंगा ।
पिता जी की चिता भस्म मस्तक पर धारण कर प्रतिज्ञापूर्ण करने का लक्ष्य बना परशु नामक अस्त्र एवं सीगों से निर्मित तीन ओर को झुका हुआ सारंग नामक धनुष लेकर वे निकल पड़े और कीर्तवीर सहस्त्रबाहु के पुत्रों को समाप्त कर दिया । तदोपरान्त एक एक करके सभी क्षत्रियों का नाश करना प्रारंभ कर दिया । दाहिने हाथ से युद्ध करना और बाएं हाथ से विजय प्राप्त करना उनका लक्ष्य था । उन्होंने क्रोध में क्षत्रीय राजाओं की 21 पीढिय़ां समाप्त कर दी जिनमें अनेक निर्दोष राजा भी थे । धरती में कोई शूरवीर क्षत्रीय राजा नहीं बचा तो धरती माता महर्षि कश्यप की शरण में गई और उनसे परशुराम को ऐसा करने से रोकने का निवेदन किया । महर्षि कश्यप ने महर्षि ऋचीक की आत्मा का आव्हान किया जो परशुराम के बाबा थे । परशुराम ने उनके आदेश को स्वीकार कर बाइसवां बार किसी भी क्षत्री राजा से युद्ध नहीं किया ।
भगवान परशुराम द्वारा दो यज्ञ यथा विश्वजित तथा वाजपेय किए गए है । उन्होंने क्षत्रीय राजाओं से जीती हुई भूमि ब्राह्मणों को दान कर दी थी ऐसे महान दानी तथा त्यागी रहे हैं भगवान परशुराम । द्वापर युग में महर्षि भारद्वाज के पुत्र द्रोणाचार्य तथा गंगा पुत्र भीष्म पितामह इनके शिष्य थे । जिन्हें युद्ध कला की शिक्षा इन्होंने दी । कर्ण ने छल कपट द्वारा इनसे दीक्षा ली । जब यह जानकारी भगवान परशुराम को मिली तो इन्होंने कर्ण को श्रापित करते हुए कहा कि अवसर पर यह विद्या भूल जायेगी ।
अत्याचारों से पीडि़त प्रजा को मुक्त करने के लिये राज सत्ता का विनाश कर युगधर्म की स्थापना करना परशुराम ऐसे युग दृष्टा काल दृष्टा एवं मंत्र दृष्टा महर्षि का ही कार्य था जिसके लिए वे सदा सदा याद रहेंगे । महेन्द्राचल पर्वत पर तपस्या हेतु चले गए । मान्यता है कि जब जब पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ेगा धर्म की मान्यताएं समाप्त होगी । भगवान की अवतार अवश्य होगा । इस समय भगवान परशुराम कही विचरण कर रहे हैं अथवा गन्दमादन पर्वत पर तपस्या में लीन है । पतित हो रहे समाज का ज्ञान होते ही उन्हें किसी न किसी रूप में अवतार लेना ही पड़ेगा । महर्षि मण्डल में भगवान परशुराम का नाम अमर है ।
अब स्थान स्थान पर ब्राह्मणों द्वारा भघवान परशुराम के मंदिर भी बन गए हैं । अस्तु अब वे भुलाए ही नहीं जा सकते हैं । जन-जन में उनके लिए श्रद्धा है, समर्पण है और विश्वास है ।

http://www.vipravarta.org/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8-...