गणेश चतुर्थी पर विशेष, वर्जित है चंद्रमा के दर्शन

भाद्रपद्र शुक्ल की चतुर्थी ही गणेश चतुर्थी कहलाती है । श्री गणोश विध्न विनाशक है । इन्हें देव समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है । भाद्रपद्र कृष्ण चतुर्थी को गणेश जी की उत्पत्ति हुई थी, उनका गजानन रुप में जन्म भाद्रपद शुक्ल चौथ को हुआ ।

श्री गणेश जी बुध्दि के देवता है । उनका वाहन चूहा है । इनका सर्वप्रिय भोग मोदक है । इस दिन प्रात:काल स्नानादि करके सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी तथा गोबर की गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है । गणेश जी की इस प्रतिका को कोरे कलश में जल भरकर मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है । मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर षोड्शोपचार से उनका पूजन करना चाहिए तथा दक्षिणा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग करने का विधान है । इनमें से पांच लडडू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राम्हणों में बांट देना चाहिए । गणेश जी की पूजा सायंकाल के समय की जानी चाहिए ।

पूजन के पश्चात नीची नजर से चंद्रमा को अर्ध्य देकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए । नीची नजर से चंद्रमा को अर्ध्य देने का तात्पर्य है जहां तक सम्भव हो इस दिन (भाद्रपद चतुर्थी) को चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है । क्योंकि एक बार चंद्रमा ने गणेश जी का गजमुख व लम्बोदर देखकर उनका मजाक उड़ाया था, गणोश जी ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि आज से जो भी तुम्हें देखेगा उसे मिथ्या कल्रंक लगेगा । चंद्रमा द्वारा माफी मांगने व श्रापमुक्त करने के अनुरोध पर वर्ष भर में एक दिन भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन से कलंक लगने का विधान बना ।

इस दिन चांद के दर्शन करने से भगवान श्री कृष्ण को भी मणि चोरी का कलंक लगा था । गणेश जी का यह पूजन करने से बुध्दि और ॠध्दि-सिध्दि की प्राप्ति होती है तथा विध्न बाधाओं का समूल नाश हो जाता है । - संकलन - करूणा तिवारी, विधि सलाहकार